Punjab Deras: पंजाब का सामाजिक और धार्मिक ताना-बाना धीरे-धीरे बदल रहा है? सिख धर्म ने लोगों को छुआछूत से मुक्ति दिलाने का वादा किया था. लेकिन जब जमीनी स्तर पर इसे लागू करने का समय आया तो वो सामाजिक समानता दिलाने में विफल रहा. सिख गुरुओं द्वारा अस्पृश्यता के खिलाफ दिए गए उपदेशों और समानता के प्रचार के बावजूद जातिवादी पूर्वाग्रह और वर्चस्व कायम रहा. इस बदलाव में ‘डेरों’ का उदय, पारंपरिक धार्मिक संस्थाओं के साथ उनका टकराव और राजनीतिक दलों द्वारा उनका उपयोग सभी कुछ शामिल है. अनुयायियों की संख्या का एक बड़ा हिस्सा डेरों या संप्रदायों की ओर इसलिए आकर्षित हो रहा है. क्योंकि पंजाब के समाज के निम्न जातियों और निचले तबकों के लोग अपनी एक अलग पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं.डेरे या संप्रदाय उतने ही पुराने हैं जितना खुद सिख धर्म. हालांकि उनके अनुयायी हर जाति से आते हैं, लेकिन उनमें मुख्यतः दलित और अन्य पिछड़े वर्ग का बोलबाला है. पंजाब में डेरा शब्द का प्रयोग अक्सर ऐसे धार्मिक और सामाजिक केंद्रों के लिए किया जाता है जो किसी संत या आध्यात्मिक गुरु द्वारा स्थापित किए गए हैं. इन डेरों का पंजाब की सामाजिक और राजनीतिक संरचना पर गहरा प्रभाव है. ये डेरे अपने अनुयायियों को आध्यात्मिक शिक्षा देने के साथ-साथ कई तरह के सामाजिक कार्य भी करते हैं, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक सेवा. इन डेरों या संप्रदायों का नेतृत्व स्वयंभू बाबा कर रहे हैं, जिन्होंने रूढ़िवादी सिखों और अन्य लोगों के बीच सामाजिक तनाव का फायदा उठाया है.
