Explainer : चांद पर क्यों परमाणु रिएक्टर बनाना चाहता है अमेरिका, उससे क्या होगा, रूस- चीन भी करना चाहते हैं ये काम

अमेरिका चांद पर अगले पांच सालों में एक परमाणु रिएक्टर बनाने जा रहा है. इससे पहले वह चांद पर एक बेस और मानवीय बस्ती भी बसा सकता है. जिसमें कुछ घर बनेंगे. सवाल ये उठता है कि अमेरिकी अंतरिक्ष संस्थान नासा ऐसा क्यों कर रहा है. ये रिएक्टर वहां करेगा यानि कौन से काम आएगा. अमेरिका की ही तरह रूस और चीन भी ऐसा ही कर रहे हैं.सवाल – अमेरिका चांद पर परमाणु रिएक्टर क्यों बनाना चाहता है?– चांद पर भविष्य में लंबे समय तक रहने और वहां पर रिसर्च बेस बनाने या खनिज संसाधनों की खुदाई जैसे कामों के लिए स्थायी ऊर्जा स्रोत जरूरी है. चांद पर सौर ऊर्जा सीमित है क्योंकि वहां 14दिनों की रात और 14 दिनों का दिन होता है. भारत के 28 दिन चांद के एक दिन के बराबर हैं. जब वहां 14 दिनों की रात होती है तो तब ऊर्जा की बहुत जरूरत होती है. ऐसे में वहां नॉन-स्टॉप बिजली देने के लिए परमाणु ऊर्जा ही सबसे विश्वसनीय विकल्प मानी जा रही है.सवाल – इसके लिए अमेरिका किस तरह अपने इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाएगा?– अमेरिका की “आर्टेमिस योजना” के तहत वह 2026 तक इंसानों को चांद पर दोबारा भेजना चाहता है. इसके जरिए चांद पर लूनर बेस बनाया जाएगा स्थायी तौर पर मानव के रहने की स्थायी बनाया जाएगा. परमाणु रिएक्टर इस पूरी योजना का ऊर्जा इंजन होगा. हालांकि अमेरिका वहां ये सब करके स्पेस डोमिनेंस बनाना चाहता है. यह भू-राजनीतिक दृष्टि से रूस और चीन पर बढ़त हासिल करने की रणनीति भी है लेकिन रूस और चीन भी इसी तरह के प्रोजेक्ट में उसके साथ आना चाहते हैं.सवाल – ये रिएक्टर कैसे बनेगा और काम करेगा?– अमेरिकी स्पेस एजेंसी NASA, ऊर्जा विभाग और कुछ निजी कंपनियां मिलकर इसे बना रही हैं। इसे फिजन सरफेस पॉवर सिस्टम कहा जाता है. इसके जरिए करीब 40 किलोवॉट बिजली लगातार 10 वर्षों तक बनती रहेगी. जिससे 30 घरों को लगातार चलाया जा सकता है. जो लूनर बेस के लिए पर्याप्त माना जाता है. ये रिएक्टर धरती से ऊपर ले जाया जाएगा. वहां इसको स्थापित किया जाएगा. यह रिएक्टर बेहद हल्का और कॉम्पैक्ट होगा.इसमें समृद्ध यूरेनियम (HALEU) का इस्तेमाल किया जाएगा. इसे स्वचालित रूप से चलाया जाएगा. इंसानी हस्तक्षेप की जरूरत नहीं होगी. इसे 2030 तक चांद की सतह पर स्थापित करने का लक्ष्य है. इसे चांद में दक्षिणी ध्रुव के पास स्थापित किया जाएगा, जहां जल बर्फ मौजूद है.सवाल – इस काम में अमेरिका की कौन सी एजेंसियां लगी हुई हैं?– नासा इस पूरे मिशन की प्लानिंग और संचालन करेगा. उसके साथ इस काम में यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी और लाकहीड मार्टिन, वेस्टिंगहाउस और बीडब्ल्यूएक्सटी की मदद मिलेगी.सवाल – इस मिशन में रूस और चीन क्यों साथ आना चाहते हैं?– रूस और चीन धरती पर हमेशा अमेरिका के साथ टकराव की स्थिति में रहते हैं. अंतरिक्ष के मामलों में भी वो अमेरिका से आगे निकलना चाहते हैं लेकिन इसमें दिलचस्पी दिखा रहे हैं. इसकी वजह ये है कि रूस और चीन के पास भी स्पेस न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी की महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं. चीन चांद पर अपने खुद के बेस बनाने की योजना पर काम कर रहा है. जिसमें परमाणु रिएक्टर जैसी टेक्नोलॉजी की जरूरत होगी.हाल ही में एक संयुक्त वैश्विक फ्रेमवर्क की चर्चा चल रही है जिसमें चांद और अन्य खगोलीय पिंडों पर परमाणु उपकरणों के प्रयोग को लेकर साझा नियम और मानक बनाए जा सकते हैं. इसमें अमेरिका, रूस और चीन तीनों साझेदार बन सकते हैं ताकि भविष्य में कोई भी देश तकनीक का सैन्य उपयोग न कर सके.सवाल – लेकिन चांद पर परमाणु रिएक्टर के खतरे क्या हैं?– अगर लांच के समय रॉकेट दुर्घटनाग्रस्त हुआ तो धरती पर परमाणु रिसाव हो सकता है. कोई देश चुपके से रिएक्टर को लेज़र वेपन या अन्य हथियारों में बदल सकता है. भले चांद पर जीवन न हो, लेकिन वहां की सतह और कक्षा में मानवजनित रेडियोधर्मी प्रभाव हो सकते हैं. हालांकि अमेरिका और NASA ने कहा है कि वे पूरी सुरक्षा प्रोटोकॉल के साथ काम कर रहे हैं और यह योजना पूरी तरह शांतिपूर्ण उपयोग के लिए है.सवाल – क्या इस प्रोजेक्ट में रूस और चीन भी साथ आ रहे हैं?– इस प्रोजेक्ट में तो नहीं लेकिन इसी से मिलते जुलते इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन (ILRS) में रूस और चीन साथ में काम कर रहे हैं. रूकोसमॉस और चाइना नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन ने मार्च 2021 में ILRS के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें चांद पर वैज्ञानिक स्टेशन बनाना शामिल है. ILRS का उद्देश्य 2035 तक चंद्र दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में एक स्थायी मानव रहित/मानवयुक्त बेस स्थापित करना है. रूस और चीन 2033–2035 के बीच चांद पर एक आटोमेटेड फ्यूजन या फिशन आधारित परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाने की योजना बना रहे हैं. यह संयंत्र ILRS के लिए बिजली उपलब्ध कराएगा और भविष्य के लूनर (चंद्र) अनुसंधान एवं संभावित मानव मिशनों को ऊर्जा देगा.ILRS परियोजना में रूस और चीन के अलावा लगभग 10–50 अन्य देशों और सैकड़ों संस्थानों के शामिल होने की उम्मीद है, जैसे थाईलैंड, पाकिस्तान, यूएई, दक्षिण अफ्रीका, वेनेज़ुएला, अजेरबैजान, थाईलैंड आदि. भारत और अन्य BRICS देशों को भी इस परियोजना में शामिल होने के निमंत्रण मिले हैं, हालांकि अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हुई है.सवाल – क्या अमेरिका इस पार्टनरशिप में शामिल नहीं है?– अमेरिका अपनी Artemis योजना के तहत अलग से एक 40–100 किलोवॉट का लूनर फिशन रिएक्टर 2030 तक चांद पर स्थापित करने की तैयारी कर रहा है. US का रिएक्टर ILRS से अलग है और इसमें रूस या चीन को सीधा भागीदार नहीं बनाया गया है.

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