Bihar Politics : बिहार की राजनीति में कुर्सी बदलने के साथ-साथ बंगला बदलने का इतिहास भी जुड़ा रहा है. लेकिन 2014–15 का दौर कुछ ज्यादा नाटकीय और दिलचस्प था, जब सत्ता तो बदली ही, साथ में सीएम बंगले को लेकर ऐसी खींचतान हुई कि वह ‘फल की जंग’ से लेकर कोर्ट-राजभवन तक चर्चा का विषय बन गया. उस राजनीतिक दौर की कहानी आज इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि राबड़ी देवी बंगला विवाद के बीच फिर सवाल उठ रहा है कि-बिहार में सत्ता की असली ताकत कुर्सी में है या बंगले में?
पटना. बिहार की राजनीति में उतार-चढ़ाव तो हमेशा रहते हैं, लेकिन 2014-15 का दौर कुछ खास था. पूर्व उपमुख्यमंत्री राबड़ी देवी के बंगला विवाद के बीच यह कहानी भी दिलचस्प है. दरअसल, यह कहानी मुख्यमंत्री पद की कुर्सी और पटना के 1, अणे मार्ग स्थित बंगले की है. उस दौर में नीतीश कुमार बिहार सुशासन और विकास के प्रतीक की तौर पर पहचान बना चुके थे, लेकिन घटनाक्रम कुछ ऐसा हुआ कि अचानक इस्तीफा देकर सत्ता छोड़ दी थी. इसके बाद वह फिर नौ महीने बाद लौटते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री वाला बंगला वापस पाने में उन्हें तीन महीने की जद्दोजहद करनी पड़ी.
राबड़ी बंगला विवाद के बीच पुरानी कहानी चर्चा मेंसब कुछ शुरू होता है 2014 के लोकसभा चुनाव से. नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) पार्टी ने भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ा था और इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा. बिहार की 40 सीटों पर जेडीयू सिर्फ दो पर सिमट गई. नीतीश कुमार को नैतिक जिम्मेदारी महसूस हुई और 17 मई 2014 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. इस्तीफे के साथ ही उन्होंने कहा, “मैं अपनी गलती मानता हूं और जदयू अब नया नेतृत्व चुनेगा.” सत्ता हस्तांतरण की रणनीति तैयार हुई और नीतीश कुमार ने अपने करीबी और दलित समुदाय से आने वाले जीतन राम मांझी को चुना. मांझी इसलिए कि कई बार वह सामाजिक न्याय के मुद्दे पर नीतीश कुमार के साथ खड़े रहे थे. 20 मई 2014 को मांझी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और इसके बाद नीतीश कुमार ने बंगला भी छोड़ दिया. 1, अणे मार्ग वाला सीएम बंगला जीतन राम मांझी के हवाले कर दिया और खुद वे 7, सर्कुलर रोड पर चले गए जो पूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए आरक्षित था.
