तेजस्वी की मीटिंग से क्यों बाहर रही कांग्रेस? बिहार में अब दो ही रास्ते, अंदर की बात बाहर आ गई!

Congress RJD Rift : महागठबंधन की बैठक में तेजस्वी यादव को सर्वसम्मति से नेता चुन लिया गया, लेकिन इसमें कांग्रेस के विधायक मौजूद नहीं थे. यही बात राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है. ऐसे में बिहार की राजनीति में इस समय सबसे बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस अब किस दिशा में जा रही है? सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या कांग्रेस अब बिहार की राजनीति में अपनी अलग राह बनाने की तैयारी कर रही है?

पटना. बिहार विधानसभा का सत्र कल 1 दिसंबर से शुरू हो रहा है. इससे ठीक दो दिन पहले, 29 नवंबर को महागठबंधन की मीटिंग पटना में हुई. मीटिंग में जो हुआ वह बिहार की राजनीति में उभरती नई तस्वीर की कहानी कहता दिखा. दरअसल, मीटिंग में तेजस्वी यादव को विधानसभा में महागठबंधन का नेता चुन लिया गया. आरजेडी के सारे विधायक थे, लेफ्ट वाले भी शामिल हुए, लेकिन कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं पहुंचा. बस एक एमएलसी समीर कुमार सिंह आए, वो भी सिर्फ दिखाने के लिए. कांग्रेस ने कहा – हमारे सारे विधायक दिल्ली में अपनी अलग मीटिंग कर रहे हैं.आरजेडी वाले कह रहे हैं – कोई बात नहीं, तेजस्वी ही नेता हैं. लेकिन, सूत्रों से मिली अंदर की खबर तो यही है कि कांग्रेस ने साफ मना कर दिया है.

कांग्रेस का पिछला रिकॉर्ड और बदलाव की दिशाबता दें कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कांग्रेस महागठबंधन का हिस्सा रही, लेकिन प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा. पार्टी ने 61 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और सिर्फ 6 सीटें जीत पाई और वोट शेयर लगभग 8.71% प्रतिशत रह गया. राजनीति के जानकारों के मुताबिक कांग्रेस अपने वोट बैंक को बचाने में भी असफल रही. अब कांग्रेस के नेता इस का ठीकरा राजद नेतृत्व पर थोप रहे हैं. 29 नवंबर को तेजस्वी यादव को महागठबंधन का नेता चुने जाने वाली बैठक में कांग्रेस की अनुपस्थिति सिर्फ एक औपचारिक ग़ैरमौजूदगी नहीं थी. यह संकेत माना जा रहा है कि कांग्रेस महागठबंधन के निर्णय लेने की प्रक्रिया से खुद को अलग महसूस कर रही है. बिहार में पिछले कुछ महीनों से यह चर्चा है कि कांग्रेस अपने संगठन को मजबूत कर अगला चुनाव अकेले लड़ने का विकल्प रख सकती है.साल दर साल बिहार में नीचे जाती रही कांग्रेसदरअसल, कांग्रेस बिहार में कभी मजबूत राजनीतिक ताकत रही है, लेकिन पिछले दो दशकों में पार्टी का जनाधार लगातार घटता गया है. वर्ष 2005 अक्टूबर चुनाव में कांग्रेस को 9 सीटें मिलीं और वोट शेयर 6.09% रहा. उसके बाद तो कांग्रेस ने हिम्मत नहीं की. हां, वर्ष 2010 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ा था. उस चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 4 सीटें मिली थीं और उसका वोट शेयर करीब 8.37% था. जाहिर है यह प्रदर्शन कांग्रेस के लिए बड़ा झटका था. इसके बाद पार्टी ने 2015 में राजद-जदयू गठबंधन और 2020 में महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा. 2015 में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा और उसे 27 सीटें मिलीं और वोट शेयर 6.7% मिला. उस चुनाव ने कांग्रेस को राहत दी थी, लेकिन यह स्पष्ट हुआ कि सफलता राजद-जदयू के साथ गठबंधन की वजह से थी. इसके बाद वर्ष 2020 में कांग्रेस ने 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और सिर्फ 19 सीटों पर जीत सकी. वोट प्रतिशत लगभग 9.5% रहा. जाहिर है यह प्रदर्शन फिर से पार्टी की स्थिति पर सवाल खड़े करने वाला था.

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