रतन टाटा की पहली कार इंडिका की असफलता के बाद उन्हें अपना बिजनेस बेचने के लिए फोर्ड के पास जाना पड़ा. उस अपमानजनक मीटिंग ने रतन टाटा का हौसला तोड़ा नहीं, बल्कि उन्हें बड़ी प्रेरणा दी. आठ साल बाद, समय का पहिया घूमा और रतन टाटा ने उसी फोर्ड कंपनी की सबसे शानदार कार कंपनियां जगुआर और लैंड रोवर को खरीदकर एक शानदार जवाब दिया. उनकी यह कहानी हर शख्स के लिए प्रेरणास्रोत है.
Tata Indica story: अमेरिका के डेट्रॉयट शहर में कार बनाने वाली कंपनी फोर्ड के हेडक्वार्टर में रतन टाटा (Ratan Tata) और बिल फोर्ड (Bill Ford) के बीच एक मीटिंग चल रही थी. बिल फोर्ड कंपनी के चेयरमैन थे. यह साल 1999 के आसपास की बात है. मीटिंग का एजेंडा साफ था – टाटा इंडिका (Tata Indica) कार का पैसेंजर व्हीकल बिजनेस फोर्ड को बेचना. टाटा मोटर्स को इंडिका प्रोजेक्ट में भारी नुकसान हो रहा था और कंपनी के बोर्ड को लग रहा था कि शायद यही सही रास्ता है कि बिजनेस बेच दिया जाए. मीटिंग में जाते समय और मीटिंग करते वक्त रतन टाटा का दिल पसीजा जा रहा था.
ज़रा सोचिए, उस मीटिंग हॉल में कैसा माहौल रहा होगा. एक तरफ भारत के सबसे बड़े ग्रुप का चेयरमैन, जिसने अपनी मेहनत से एक कार बनाई, और दूसरी तरफ अमेरिकी कार मार्केट का बड़ा खिलाड़ी. रतन टाटा ने डील की बात शुरू की, लेकिन बिल फोर्ड और उनकी टीम का रवैया बहुत ही अपमानजनक था. बिल फोर्ड ने रतन टाटा से लगभग तल्ख़ लहजे में कहा, “जब आपको पैसेंजर कार बनाने का ज्ञान नहीं था, तो आपने यह बिजनेस शुरू ही क्यों किया? हम आपका यह बिजनेस खरीदकर आप पर एक एहसान कर रहे हैं.” इस एक वाक्य ने रतन टाटा को अंदर तक हिलाकर रख दिया. उन्होंने उस समय क्या-क्या सोचा होगा, यह तो केवल वही जानते होंगे.
