Nitish Kumar Political Tales : नेता वह नहीं जो कभी गिरे ही नहीं, बल्कि नेता वह है जो गिरकर और मजबूत होकर खड़ा हो जाए- नीतीश कुमार की कहानी राजनीति में एक दुर्लभ उदाहरण है- जहां हार ने नेता को तोड़ा नहीं, बल्कि दिशा दी. एक दौर आया जब अंधेरा ही अंधेरा नजर आने लगा था, लेकिन बाद में वह सुबह भी आई जब एक नया अध्याय शुरू हुआ जिसने पिछले दो दशकों में बिहार की राजनीति का नेतृत्व, गठबंधन समीकरण और प्रशासनिक प्राथमिकताएं- सब बदलकर रख दीं.impact short iconख़बरें फटाफटसबसे बड़ी खबरों तक पहुंचने का आपका शॉर्टकटगूगल परNews18 चुनेंAdvertisementपटना. लोकसभा चुनाव 2004 ने बिहार की राजनीति में बड़ा मोड़ ला दिया था. चुनाव परिणाम न सिर्फ एक संख्या थे, बल्कि राजनीतिक संदेश भी थे. उनके नेतृत्व और भविष्य की संभावनाओं को लेकर सवालों का दौर शुरू हो गया था. किसी बयान, मीटिंग या राजनीतिक चर्चा में उनकी मौजूदगी नहीं थी… बात बाढ़ लोकसभा सीट से नीतीश कुमार की हार की हार की थी. तब राज्य की सत्ता के समीकरणों से लेकर विपक्ष की रणनीति तक सबकुछ बदलकर रख दिया था. संसदीय चुनाव 2004 के समय बिहार की राजनीति उस समय उबाल पर थी और राज्य सामाजिक समीकरणों, जातिगत गोलबंदी और राजनीतिक बयानों के बीच जूझ रहा था. इसी चुनाव में नीतीश कुमार बाढ़ लोकसभा सीट से पराजित हुए थे. हार केवल एक संख्या भर का गुणा गणित नहीं था, बल्कि सियासी तौर पर गहरे परिणाम लेकर आया था. वह उनके आत्मविश्वास, उनके राजनीतिक भविष्य और उनकी नेतृत्वकारी छवि पर गहरा सवाल था. वह नेता, जिसे कई लोग लालू यादव के विकल्प के रूप में देख रहे थे, अचानक राजनीतिक अंधेरे में खड़े थे. उस दौर की राजनीति के जानकार कहते है कि परिणाम आने के बाद नीतीश कुमार चार दिनों तक किसी से नहीं मिले. ना प्रेस से बयान, ना पार्टी मीटिंग, ना कोई आयोजन. मानो राजनीतिक मंच से वह गायब हो गए हों.नीतीश कुमार की बाढ़ सीट पर हार से लेकर बिहार के मुख्यमंत्री बनने तक की कहानी,राजनीति के जानकार बताते हैं कि नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा में एक दिलचस्प मोड़ 2004 का लोकसभा चुनाव लेकर आया था. उन्होंने बाढ़ और नालंदा दोनों सीटों से चुनाव लड़ा, लेकिन बाढ़ में राजद के विजय कृष्ण से हार गए. हालांकि, नालंदा से जीतकर उनकी सांसदी बच गई, लेकिन बाढ़ की हार ने नीतीश को गहरा झटका दिया था. दरअसल, उनका बचपन यहीं गुजरा था, पढ़ाई यहीं हुई थी. एक बार उन्होंने कहा भी, मैं कहीं भी रहूं, मेरा दिल बाढ़ में ही है. ऐसे में केन्द्रीय मंत्री रहते हुए बाढ़ सीट पर मिली हार ने उन्हें विचलित कर दिया था. इस हार के बाद नीतीश कुमार चार दिनों तक सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए. किसी बयान, मीटिंग या राजनीतिक चर्चा में उनकी मौजूदगी नहीं थी. करीबी कहते हैं, उन दिनों नीतीश कुमार के सामने सवाल सिर्फ एक था- अगर मैं अपनी सीट नहीं जीत सका तो बिहार विधानसभा 2005 में जनता मुझे सत्ता का चेहरा क्यों मानेगी?2004 में बाढ़ संसदीय सीट की हार ने सब कुछ बदल दियाजनता मुझे सत्ता का चेहरा क्यों मानेगी? यही सवाल आगे चलकर उनके राजनीतिक शक्ति और वापसी का आधार बना. जानकार बताते हैं कि यही वह समय था जब नीतीश कुमार सिर्फ यही सोच रहे थे कि बिहार की राजनीति को बदलना है तो उनको अपनी रणनीति भी बदलनी होगी. चार दिनों बाद जब नीतीश फिर सार्वजनिक रूप से सामने आए तो उनका तरीका बदला था, सोच बदली थी और राजनीति का लक्ष्य भी. करीबी बताते हैं कि इन्हीं दिनों नीतीश कुमार ने फैसला किया कि बिहार की राजनीति में सिर्फ जातीय संतुलन और नारे नहीं, विकास और भरोसे की जरूरत है. वे अब सिर्फ एक नेता नहीं – एक विकल्प बनेंगे.फरवरी 2005 में पहली बड़ी परीक्षा और अधूरा जनादेशइसके बाद 2005 का पहला विधानसभा चुनाव आया. फरवरी का वह चुनाव बिहार की राजनीति में एक मोड़ था. एक तरफ RJD और लालू प्रसाद का एक दशक से अधिक का शासन था, दूसरी तरफ NDA और उसके मुख्यमंत्री पद के दावेदार नीतीश कुमार. सामाजिक न्याय का पुराना नारा और NDA का नया विकास एजेंडा आमने-सामने था. परिणाम आए- RJD सबसे बड़ी पार्टी रही, लेकिन बहुमत से दूर.फरवरी 2005 के चुनाव में NDA (JDU+BJP) 92 सीटें जीतकर सबसे बड़ा गठबंधन बना, लेकिन बहुमत से 30 सीट दूर रह गया. लालू यादव और राबड़ी देवी सरकार बनाने की कोशिश में थे पर रामविलास पासवान की लोजपा ने समर्थन नहीं दिया और राष्ट्रपति शासन लग गया.अक्टूबर 2005 में दूसरा मौका, नई हवा और स्पष्ट संदेशइस अधूरे जनादेश ने बिहार की राजनीति को झकझोर दिया. आठ महीनों तक सत्ता की कुर्सी खाली रही और उस दौरान बिहार की जनता बदलाव की खोज में और अधिक बेचैन हो गई. माहौल बदल चुका था और लोग व्यवस्था चाहते थे, स्थिरता चाहते थे और एक नए नेतृत्व की तलाश में थे. यही वह दौर था जिसमें नीतीश का राजनीतिक चरित्र अधिक दृढ़ और अधिक स्वीकार्य होने लगा. नीतीश कुमार ने हार नहीं मानी और आठ महीने बाद फिर चुनाव हुआ, लेकिन इस बार माहौल अलग था. बिहार में भ्रष्टाचार, अपहरण उद्योग और सुशासन की मांग जोर पकड़ चुकी थी. चुनाव कैंपेन में नीतीश कुमार की रैलियों में भीड़ बढ़ रही थी और BJP-JDU गठबंधन का स्वर बदल चुका था. विकास और विश्वास के नारे के साथ जनता बदलाव के लिए आगे आ रही थी.हार की सबक ने बिहार का सबसे ताकतवर नेता बना दियाअक्टूबर 2005 में जब फिर से चुनाव हुए तो हवा की दिशा साफ थी. रैलियों में भीड़ का रुझान, लोगों की बातों का लहजा और राजनीतिक समीकरणों का संतुलन इस बात की घोषणा कर रहे थे कि इस बार बिहार एक नए अध्याय की ओर बढ़ रहा है. नतीजे आए और NDA को स्पष्ट बहुमत हासिल हुआ. NDA ने 143 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया-JDU को 88 और BJP को 55 सीटें मिलीं. साफ था कि NDA ने बहुमत हासिल कर लिया और RJD सत्ता से बाहर हो गई. 24 नवंबर 2005 को नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने. जाहिर है जिस बाढ़ संसदीय क्षेत्र की हार ने उन्हें चार दिन ‘अंधेरे’ में रहने को विवश कर दिया था, उसी हार की सबक ने उन्हें बिहार का सबसे ताकतवर नेता बना दिया था.2005 से आगे रणनीति, नेतृत्व और बदलाव की कहानीजानकारों की नजर में यह जीत नीतीश कुमार के लिए यह सिर्फ राजनीतिक वापसी नहीं थी, यह उस आत्ममंथन की जीत थी जो उन्होंने 2004 की हार के बाद किया था. अक्टूबर 2005 में फिर चुनाव हुए और इस बार और बाढ़ की हार को ताकत में बदल दिया! नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने तो यह कुर्सी सिर्फ सत्ता की नहीं थी, बल्कि यह उनके धैर्य, उनके आत्ममंथन और उनके पुनर्निर्माण की जीत थी. नीतीश कुमार ने सत्ता संभालते ही सीएम चेयर को कुर्सी नहीं, जिम्मेदारी माना. कानून-व्यवस्था सुधरी, सड़कें बनीं, शिक्षा में सुधार के कदम उठे और उनकी राजनीति जाति समीकरणों से आगे प्रशासनिक सुधार, सामाजिक न्याय और विकास – ये सब नीतीश कुमार के शासन की पहचान बनी.कभी-कभी हार नेता को इतिहास लायक बना देती है!जानकार कहते हैं कि जैसे-जैसे नीतीश कुमार की शासन का दौर आगे बढ़ा तो जनता के बीच धीरे-धीरे यह धारणा मजबूत होती गई कि वह केवल राजनीतिक समीकरण संभालने वाले नेता नहीं, बल्कि एक रणनीतिकार और प्रशासकीय सोच वाले नेता हैं. आज लगभग दो दशक बाद पीछे देखा जाए तो नीतीश कुमार की 2005 की वापसी सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि बिहार की राजनीति में नेतृत्व, रणनीति और विजन की परिभाषा बदलने वाला क्षण थी. 2004 की हार ने उन्हें रोका नहीं-उसने उन्हें नया बनाया. और यही कारण है कि वह हार आज उनके राजनीतिक सफर की सबसे महत्वपूर्ण ईंट मानी जाती है. सार यही है कि – राजनीति में जीतें इतिहास लिखती हैं, लेकिन कभी-कभी हार नेता को इतिहास लायक बनाती है.About the AuthorVijay jhaपत्रकारिता क्षेत्र में 22 वर्षों से कार्यरत. प्रिंट, इलेट्रॉनिक एवं डिजिटल मीडिया में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन. नेटवर्क 18, ईटीवी, मौर्य टीवी, …और पढ़ेंLocation :Patna,BiharFirst Published :December 06, 2025, 10:57 ISThomebihar2004 के वो 4 दिन जब ‘अंधेरे’ में थे नीतीश कुमार… फिर लिखी गई कमबैक की कहानी!और पढ़ें
पटना. लोकसभा चुनाव 2004 ने बिहार की राजनीति में बड़ा मोड़ ला दिया था. चुनाव परिणाम न सिर्फ एक संख्या थे, बल्कि राजनीतिक संदेश भी थे. उनके नेतृत्व और भविष्य की संभावनाओं को लेकर सवालों का दौर शुरू हो गया था. किसी बयान, मीटिंग या राजनीतिक चर्चा में उनकी मौजूदगी नहीं थी… बात बाढ़ लोकसभा सीट से नीतीश कुमार की हार की हार की थी. तब राज्य की सत्ता के समीकरणों से लेकर विपक्ष की रणनीति तक सबकुछ बदलकर रख दिया था. संसदीय चुनाव 2004 के समय बिहार की राजनीति उस समय उबाल पर थी और राज्य सामाजिक समीकरणों, जातिगत गोलबंदी और राजनीतिक बयानों के बीच जूझ रहा था. इसी चुनाव में नीतीश कुमार बाढ़ लोकसभा सीट से पराजित हुए थे. हार केवल एक संख्या भर का गुणा गणित नहीं था, बल्कि सियासी तौर पर गहरे परिणाम लेकर आया था. वह उनके आत्मविश्वास, उनके राजनीतिक भविष्य और उनकी नेतृत्वकारी छवि पर गहरा सवाल था. वह नेता, जिसे कई लोग लालू यादव के विकल्प के रूप में देख रहे थे, अचानक राजनीतिक अंधेरे में खड़े थे. उस दौर की राजनीति के जानकार कहते है कि परिणाम आने के बाद नीतीश कुमार चार दिनों तक किसी से नहीं मिले. ना प्रेस से बयान, ना पार्टी मीटिंग, ना कोई आयोजन. मानो राजनीतिक मंच से वह गायब हो गए हों.
