लंदन अपने इतिहास के काले दिन को आज 73 साल बाद भी नहीं भूला पाता है. ये एक ऐसा काला दिन था, जब हवा में मौत आ गई थी. इस काले इतिहास में एक-दो नहीं कम से कम 12 हजार लोगों की मौत हो गई थी. इसी काले दिन की बात करने जा रहे हैं हम.
साल 1952 था, समय सुबह का. लंदन की सड़कों पर लोग रोज की तरह काम पर निकल रहे थे. लेकिन, उस दिन कुछ अलग ही था. आसमान से उतरा कोहरा इतना घना था कि सामने का आदमी भी नहीं दिख रहा था. लोग इसे नॉर्मल ‘लंदन फॉग’ समझकर निकल पड़े. कोई नहीं जानता था कि यह कोहरा नहीं, मौत का कफन है. अगले चार दिनों में लंदन की आबादी के ऊपर काला साया मंडराते रहा, जो हजारों लंदनवासियों के लिए मौत लेकर आया था. दरअसल, यह ‘ग्रेट स्मॉग ऑफ़ लंदन’ इसे इतिहास का सबसे भयानक प्रदूषण हादसा माना जाता है.
शुरू से शुरू करते हैं: इसकी शुरुआत 5 दिसंबर को हुई. ठंड बहुत थी. लाखों घरों में कोयले की आग जला रही थी. फैक्ट्रियां भी धुआं उगल रही थीं. कारें और बसें डीजल-पेट्रोल का तो क्या ही कहना, ये भी प्रदूषण में जी भरकर अपना योगदान दे रहीं थी. अचानक मौसम ने पलटी मारी. एक हाई-प्रेशर एंटी-साइक्लोन ने हवा को स्थिर कर दिया. सारा धुआं, सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन पार्टिकल्स और जहरीली गैसें नीचे ही फंस गईं. देखते ही देखते पूरा लंदन कोहरा जैसे सिचुएशन में समा गया, मगर ये कोहरा नहीं था. यह एक काला, चिपचिपा, सल्फर की तेज गंध वाला जहर था. विजिबिलिटी 1 फुट तक सिमट गई. लोग दीवारों से टकराकर चल रहे थे. बसें रेंग रही थीं. टैक्सी ड्राइवर पैदल चलकर गाड़ी ले जा रहे थे.दूसरे दिन बिगड़े हालातदूसरे दिन तक हालात और बिगड़े. सांस लेना मुश्किल हो गया. आंखों में जलन और गले में खराश वाले अस्पतालों में मरीजों की बाढ़ आ गई. सबसे ज्यादा प्रभावित हुए बच्चे और बुजुर्ग. ब्रॉन्काइटिस, निमोनिया, दिल के दौरे पड़ने लगे. अस्पताल में डॉक्टरों के पास ऑक्सीजन तक खत्म होने लगी. 7 दिसंबर तक 700 से ज्यादा मौतें हो चुकी थीं. लोग घरों में कैद हो गए. सिनेमाघर बंद हो गए क्योंकि परदे पर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था.
