उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान को अदालत ने कई दिन पहले रिहा करने का आदेश दे दिया था लेकिन उनकी रिहाई में देर हो गई. जब उन्होंने अपने कई मामलों में सजा से संबंधित जुर्माने की रकम जमा कराई, तभी उनकी रिहाई हो पाई. समझते हैं कि कोर्ट के आदेश के बाद जेल से रिहाई कैसे होती है कब बांड की जरूरत पड़ती है और जुर्माने की रकम का रिहाई से क्या रिश्ता हैजब अदालत किसी अभियुक्त को सज़ा सुनाती है, तो अक्सर यह दो हिस्सों में होती है. कैद और जुर्माना. कई बार कोर्ट किसी सजा में कैद और जुर्माने का आदेश देती है.जैसे“अमुक को 2 साल की कैद और ₹25,000 जुर्माने की सज़ा दी जाती है. जुर्माना नहीं भरने पर 3 महीने की अतिरिक्त कैद भुगतनी होगी.”इसका मतलब यह हुआ कि कैदी को या तो जुर्माना भरना पड़ेगा या फिर वह अतिरिक्त कैद भुगतेगा.आज़म ख़ान के खिलाफ कई केस थे. जिनमें से कुछ मामलों में उन्हें सज़ा सुनाई गई थी और जुर्माना भी लगाया गया था. जब उन्होंने उन मामलों में जमानत हासिल की, तब भी जेल प्रशासन ने देखा कि एक या अधिक मामलों में जुर्माना बकाया है. जब तक वह जुर्माना जमा नहीं हुआ, तब तक कानूनी रूप से उनकी सज़ा पूरी नहीं मानी जा सकती थी. इस वजह से उनकी रिहाई का आदेश आने के बावजूद जेल से बाहर निकलने में देर हुई, क्योंकि पहले जुर्माना भरना ज़रूरी था.
