पर उपदेश कुशल बहुतेरे, आपही करहि नर न घनेरे” — यानी उपदेश देना आसान है, लेकिन उस पर अमल करना कठिन. यही दोहरापन अमेरिका के रवैये में साफ़ दिखता है. एक ओर वह रूस–यूक्रेन युद्ध को ‘असहनीय’ बताता है और कहता है कि अब ‘खून-खराबा बंद होना चाहिए’; वहीं दूसरी ओर वह यूक्रेन को अरबों डॉलर की सैन्य और आर्थिक मदद देता जा रहा है — पैट्रियट मिसाइल से लेकर ड्रोन तक. इतना ही नहीं, राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर ये आरोप लगाकर कि वह रूस से सस्ता तेल खरीदकर ‘युद्ध को पोषित’ कर रहा है, अमेरिका ने 50% टैरिफ भी लगाया है.24 फरवरी 2022 को रूस द्वारा यूक्रेन पर बड़े हमले के बाद से अमेरिका यूक्रेन का सबसे बड़ा समर्थक बनकर उभरा है — सिर्फ बातों में नहीं, बल्कि पैसों और हथियारों में भी. 12 मार्च 2025 तक, अमेरिका यूक्रेन को $66.9 अरब डॉलर (5,86,746 करोड़ रुपये) की सैन्य मदद दे चुका है, जिसमें आधुनिक हथियार, गोला-बारूद, ट्रेनिंग और जंग के मैदान में रियल-टाइम इंटेलिजेंस शामिल है.इसके अलावा, ‘प्रेसिडेंशियल ड्रॉडाउन अथॉरिटी’ के तहत अमेरिका ने यूक्रेन को अपने मिलिट्री स्टॉक से करीब $31.7 अरब डॉलर (2,78,043 करोड़ रुपये) के हथियार सीधे दिए हैं. 2021 से अब तक 55 बार ऐसे अवसर आये हैं जब ‘प्रेसिडेंशियल ड्रॉडाउन अथॉरिटी’ का इस्तेमाल किया गया है.
