1960 का दशक! एक तरफ़ शीत युद्ध की तपिश, दूसरी तरफ़ अपने पैरों पर खड़े होने की भारत की जद्दोजहद. पश्चिमी देशों के मना करने पर नेहरू ने सोवियत संघ की ओर हाथ बढ़ाया. क्या था वो ‘टर्निंग पॉइंट’ जब सोवियत संघ ने भारत को भिलाई स्टील प्लांट और मिग-21 जैसे आधुनिक हथियार देने का फ़ैसला किया? कश्मीर पर सोवियत वीटो ने कैसे पाकिस्तान के मंसूबों पर पानी फेरा? पढ़िए, पंडित नेहरू और सोवियत नेताओं के बीच की वो भावनात्मक और सामरिक दोस्ती, जिसने भारत के आर्थिक और सैन्य भविष्य की नींव रखी
नई दिल्ली. दिसंबर 1959. रात का वक़्त था. दिल्ली की सर्दी हड्डी तक जम रही थी, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को नींद नहीं आ रही थी. उनके चेहरे पर चिंता की एक गहरी लकीर थी. आज़ादी को ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ था और नेहरू का सपना था कि भारत अपने पैरों पर मज़बूती से खड़ा हो, किसी के आगे हाथ न फैलाए. लेकिन सच ये था कि देश में बड़े कारखाने, बिजली के प्रोजेक्ट और अपनी सेना के लिए हथियार बनाने की तकनीक या तो थी ही नहीं या बहुत कम थी. पश्चिमी देशों की तरफ़ से उन्हें कोई ख़ास मदद नहीं मिल रही थी. हर तरफ़ से “ना” ही सुनने को मिल रही थी.
