ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो अपने काम में लगे रहना चाहते हैं. और बड़े ओहदे के पीछे वे खुद नहीं भागते. जबकि ओहदे खुद चल कर उनके पास आते हैं. ऐसे लोगों की जब भी लिस्ट बनेगी पूर्व प्रधान मंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह का नाम उसमें सबसे ऊपर के एक दो लोगों में ही रहेगा. वे न तो प्लानिंग कमिशन के डिप्टी चेयरमैन बनने के इच्छुक थे, न ही वे वित्त मंत्री या प्रधानमंत्री बनना चाहते थे. लेकिन वे एक ऐसे पीएम बने जिनके दस्खत वाले नोट देश में चला करते हैं. रिजर्व बैंक गवर्नर के तौर पर नोटों पर उनके दस्तखत होते थे. बहरहाल, भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में जब भी कोई विमर्श होगा, मनमोहन सिंह उसमें जरुर शामिल रहेंगे.
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुद मानते थे कि वो एक्सीडेंटल प्रधानमंत्री ही नहीं थे बल्कि वित्तमंत्री की जिम्मेदारी भी उन्हें एक्सीडेंट से ही मिली थी. उन्होंने हंसते हुए ये भी कहा था कि मुझे भले एक्सीडेंटल प्रधानमंत्री कहा जाता है पर वो ‘एक्सीडेंटल वित्तमंत्री’ भी रहे हैं. उन्होंने बताया उनका वित्तमंत्री बनना और फिर बड़े पैमाने पर आर्थिक सुधार शुरू करना सब कुछ एक सस्पेंस थ्रिलर की तरह था जिसमें कई बड़े फैसले भी एक्सीडेंट से हो गए. 1991 के ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों के जनक मनमोहन सिंह ये तमाम राज 2018 में अपने भाषणों पर लिखी गई किताब के लॉंच के मौके पर खोले थे. आज (26 दिसंबर को) मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि पर उन पर चर्चा करने का सही वक्त है.
