कर्नाटक इस वक्त कांग्रेस के लिए सिर्फ एक शासित राज्य नहीं, बल्कि उसकी राष्ट्रीय साख और राजनीतिक क्षमता की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है. जहां एक ओर सरकार के कामकाज के नतीजे जमीन पर दिख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नेतृत्व को लेकर दिल्ली की चुप्पी ने राज्य की राजनीति में बेचैनी भर दी है. कथित सत्ता-साझेदारी के वादे पर आलाकमान का अनिर्णय न सिर्फ कार्यकर्ताओं और विधायकों को असमंजस में डाल रहा है, बल्कि शासन की गति और पार्टी की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर रहा है.
राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता को बरकरार रखने के लिए जद्दोजहद में लगी कांग्रेस के लिए कर्नाटक महज एक और राज्य भर नहीं है. यह सत्तारूढ़ कांग्रेस के लिए एक ऐसी एकमात्र मिसाल है, जहां न केवल उसकी पूर्णकालिक सरकार काम कर रही है, बल्कि उसके शासन के नतीजे भी जमीन पर दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में तकाजा तो यही था कि पार्टी आलाकमान राज्य के सियासी मामलों को असाधारण दूरदर्शिता, समझबूझ और एहतियात के साथ संभालता. लेकिन हुआ इसका उलटा. पार्टी नेतृत्व एक बार फिर किंकर्तव्यविमूढ़ नजर आ रहा है. 2023 में राज्य में सियासी संतुलन बनाए रखने के लिए किए गए सत्ता-साझेदारी के उस कथित ‘गुप्त’ वादे को लेकर उसका इरादा क्या है, वह इसे साफ नहीं कर पा रहा है.
