कोविदार या कचनार का वृक्ष सिर्फ अपने सुंदर फूलों की वजह से कवियों की प्रिय उपमा रही है. लेकिन अयोघ्या के राम मंदिर की धर्म ध्वजा पर इसे उकेरे जाने के बाद कोविदार के महत्व का जिक्र विस्तार से किया जा रहा है. फूलों से लद जाने वाला ये वृक्ष राजा राम के कुल की ध्वजा पर हमेशा से रहा है. इसका जिक्र पुराने भारतीय साहित्य की किताबों में खूब है. साथ ही कालिदास ने भी अपने ग्रंथों में इस सुंदर पेड़ का उल्लेख किया है. कचनार को अयुर्वेद की किताबों में बहुत ही औषधीय गुणों वाला बताया गया है.
अयोध्या राम मंदिर के ध्वज पर सूर्य के साथ कोविदार वृक्ष का चित्र भी उकेरा गया है. माना जाता है कि ये पेड़ राजा राम के रघुकुल के तेज, त्याग और तपस्या का ये प्रतीक है. बहुत सारे औषधीय गुणों वाला ये वृक्ष अवध वाले इलाके के लिए आम है. इसे कचनार, कचनाल या फिर कंछनार के तौर पर भी जाना जाता है. उत्तर भारत में हिमालय की तराई इलाके में ये बहुतायत में पाया जाता है. इसका जिक्र कालिदास की रचनाओं रघुवंश और मेघदूत में मिलता है. इसके अलावा पुरानी भारतीय चिकित्सा पद्धति की पुस्तकों में भी कोविदार का खूब उल्लेख मिलता है.
वाल्मिकी रामाण में लिखा है- उस महात्मा (भरत) के ध्वज पर कोविदार वृक्ष सुशोभित हो रहा है, मैं अपने विवेक और सुंदर हाथी से भी यही अनुमान करता हूं कि वे भरत ही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसका जिक्र अपने भाषण में मंगलवार को अयोध्या में किया. अयोध्या कांड में लिखा है
