नई दिल्ली. तमिलनाडु में बम धमाकों का वो काला दिन भारतीय राजनीति के इतिहास में दर्ज हो गया, जब बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की चुनावी रैली से ठीक पहले कोयंबटूर में सिलसिलेवार बम धमाकों ने पूरे शहर को दहला दिया था. इस हमले ने न सिर्फ तमिलनाडु बल्कि पूरे देश की राजनीति की दिशा बदल दी. खास बात यह थी कि यहां बीजेपी के उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन मैदान में थे और धमाकों के बावजूद उनकी किस्मत ने करवट ली. अब बीजेपी ने सीपी राधाकृष्णनन को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है.दक्षिण में पैर जमाने की कोशिशयह साल था 1998 का. केंद्र में बीजेपी अपनी पकड़ मजबूत कर रही थी. दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु पार्टी के लिए नई जमीन थी. कोयंबटूर सीट पर सीपी राधाकृष्णन को टिकट दिया गया था. रैली में आडवाणी का आना पार्टी के लिए बड़ा संकेत था कि बीजेपी दक्षिण में गंभीर दावेदारी पेश करना चाहती है.धमाके कैसे हुए?14 फरवरी की दोपहर रैली स्थल से कुछ किलोमीटर दूर कोयंबटूर शहर के अलग-अलग इलाकों में एक के बाद एक 12 से ज्यादा बम धमाके हुए. धमाकों का निशाना वे इलाके थे जहां से लोग रैली की ओर आ रहे थे. भीड़भाड़ वाले बाजार, बस अड्डे और प्रमुख सड़कों को टारगेट किया गया. इन धमाकों में करीब 58 लोग मारे गए और 200 से ज्यादा घायल हुए. धमाकों के पीछे अल-उम्माह नामक कट्टरपंथी संगठन का हाथ सामने आया.आडवाणी क्यों थे निशाने पर?1997 में कोयंबटूर में हुए हिंदू-मुस्लिम दंगों के बाद हालात तनावपूर्ण थे. बड़ी संख्या में मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी हुई थी. आडवाणी हिंदुत्व राजनीति का दक्षिण में चेहरा बन चुके थे. अल-उम्माह की साजिश थी कि उनकी रैली में ब्लास्ट कर उन्हें और बीजेपी समर्थकों को निशाना बनाया जाए. लेकिन किस्मत ने साथ दिया. आडवाणी की कार कुछ देर से निकली और वे बच गए.18 दोषियों को सजामुख्य साज़िशकर्ता एस.ए. बदरुद्दीन और उसके संगठन अल-उम्माह ने इस पूरी घटना को अंजाम दिया. बम RDX, जिलेटिन स्टिक और टाइमर डिवाइस से बनाए गए थे. पुलिस और जांच एजेंसियों ने बड़े पैमाने पर छापेमारी की. साल 2007 में कोर्ट ने 18 दोषियों को सज़ा सुनाई, जिनमें से कई को मौत और उम्रकैद की सज़ा दी गई. हालांकि 20 से अधिक आरोपी सबूतों के अभाव में बरी हो गए.राधाकृष्णन की धमाकेदार जीतधमाकों के बावजूद चुनाव हुए. सहानुभूति की लहर और हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण ने सीपी राधाकृष्णन को भारी बहुमत से विजयी बनाया. वे उस समय तमिलनाडु में सबसे बड़े अंतर से जीतने वाले उम्मीदवार बने. इस जीत ने दक्षिण भारत में बीजेपी की एंट्री का रास्ता खोला. कोयंबटूर ब्लास्ट सिर्फ़ एक आतंकी हमला नहीं था, बल्कि उस दौर की राजनीति का टर्निंग प्वाइंट था. अगर आडवाणी उस दिन धमाकों की चपेट में आ जाते, तो शायद भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल जाती. वहीं, राधाकृष्णन की जीत ने दिखाया कि संकट कभी-कभी नेताओं के लिए राजनीति में नया दरवाज़ा खोल देता है
