1958 से 2025 तक, पाकिस्तानी जनरल, तख़्तापलट और प्रधानमंत्री का बाय-बाय

1958 से 2024 तक पाकिस्तान का सत्ता इतिहास में लोकतंत्र हमेशा वर्दी की छाया में रहा. कभी तख़्तापलट के ज़रिए, कभी अदालतों और राजनीतिक इंजीनियरिंग के माध्यम से, पाकिस्तानी जनरलों ने तय किया कि प्रधानमंत्री कौन होगा और कब हटेगा. इमरान ख़ान का उदय और पतन इसी सैन्य वर्चस्व की सबसे ताज़ा मिसाल है.

पाकिस्तानी सेना के चार बुनियादी मकसद हैं—हर हाल में देश की सत्ता पर नियंत्रण बनाए रखना; बेहिसाब पैसा, ज़मीन और प्रॉपर्टी जमा करना; भारत को “सबसे बड़ा ख़तरा” बताकर अपने बजट और दख़ल को जायज़ ठहराना; और पूरे पाकिस्तान पर पंजाबी मुस्लिम वर्चस्व को बनाए रखना. यही वजह है कि पाकिस्तान ऐसा देश बन गया है जहाँ सरकारें जनता नहीं, बल्कि रावलपिंडी के जनरल HQ में तय होती हैं. प्रधानमंत्री वही बनता है जिसके सिर पर आर्मी चीफ का हाथ हो और जिस पर नहीं, उसका राजनीतिक अंत तय माना जाता है.

इमरान ख़ान पाकिस्तान के पहले नेता नहीं थे जिन्हें सेना ने सत्ता तक पहुँचाया, लेकिन वे शायद पहले थे जिन्होंने यह भ्रम पाल लिया कि सत्ता में आने के बाद वे सेना के बराबर खड़े हो सकते हैं. 2018 का चुनाव इमरान की लोकप्रियता से ज़्यादा चुनावी इंजीनियरिंग का नतीजा था. सेना को एक ऐसा चेहरा चाहिए था जो लोकप्रिय हो, पश्चिम में स्वीकार्य हो और नवाज़ शरीफ़ की तरह “ज़िद्दी” न हो. इमरान इस फ्रेम में फिट बैठते थे. सत्ता के बदले सौदा साफ़ था—’सेना की लाइन पर चलो, और प्रधानमंत्री बने रहो’.

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